महोबा। जिला मुख्यालय स्थित जिला महिला अस्पताल में GPF की रकम में करीब 85 लाख रुपये की कथित हेराफेरी का मामला सामने आने से स्वास्थ्य विभाग में हड़कंप मच गया है। इलाहाबाद से आई CAG की तीन सदस्यीय टीम के ऑडिट के दौरान कथित तौर पर सामने आया कि GPF का काम देख रहे कनिष्ठ सहायक संतोष कुमार वर्मा ने ऐसे खाते से करीब 85 लाख रुपये की निकासी कर दी, जिसमें पर्याप्त धनराशि मौजूद ही नहीं थी।
मामला सामने आते ही कर्मचारी बिना सूचना अस्पताल से गायब हो गया। बताया जा रहा है कि GPF से संबंधित महत्वपूर्ण पत्रावलियां भी उसके पास हैं। ऐसे में विभाग के सामने सबसे बड़ा सवाल यही है कि एक कनिष्ठ सहायक को GPF खाते और लाखों रुपये की निकासी से संबंधित इतनी व्यापक वित्तीय पहुंच आखिर कैसे मिली?
सीएमओ डॉ. विनय कुमार के मुताबिक CAG ऑडिट में GPF की निकासी से संबंधित गंभीर अनियमितता सामने आई है। उनके अनुसार करीब 85 लाख रुपये की निकासी का मामला सामने आया है, जबकि संबंधित खाते में उतनी धनराशि मौजूद नहीं थी। मामले में पुलिस को सूचना देने के निर्देश दिए गए हैं। जांच के बाद ही वास्तविक स्थिति और धनराशि का पूरा खुलासा हो सकेगा।
जिला महिला अस्पताल के CMS ने बताया कि ऑडिट टीम द्वारा मामला संज्ञान में लाए जाने के बाद से आरोपी कर्मचारी अस्पताल नहीं आया। उसके स्थायी और अस्थायी पते पर दो बार पत्र भेजकर उपस्थित होने के निर्देश दिए जा चुके हैं। अब उसे अंतिम अवसर दिया जा रहा है। उपस्थित नहीं होने पर पुलिस में शिकायत दर्ज कर मुकदमा कराने की कार्रवाई की जाएगी।
मामले में एक ड्राइवर का नाम भी सामने आने की बात कही जा रही है, लेकिन उसकी भूमिका जांच के बाद ही स्पष्ट होगी।
सबसे गंभीर सवाल यह है कि यदि GPF खाते में पैसा ही नहीं था तो करीब 85 लाख रुपये की निकासी किस प्रक्रिया के तहत हुई? क्या बिना किसी अन्य अधिकारी की जानकारी और सत्यापन के इतनी बड़ी रकम निकाली जा सकती है? यदि नहीं, तो फिर इस पूरी प्रक्रिया में कौन-कौन अधिकारी या कर्मचारी जिम्मेदार थे और किस स्तर पर निगरानी में चूक हुई?
अब जांच सिर्फ कर्मचारी द्वारा कथित निकासी तक सीमित न रहकर यह भी तय करने की जरूरत है कि GPF की पत्रावलियों, भुगतान प्रक्रिया, बिल-वाउचर, पासबुक/लेजर और संबंधित स्वीकृतियों की निगरानी किस अधिकारी के जिम्मे थी। साथ ही यह भी जांच जरूरी है कि सामने आई करीब 85 लाख रुपये की राशि ही पूरी अनियमितता है या पत्रावलियां गायब होने के कारण वास्तविक रकम इससे कहीं अधिक है।
एक कनिष्ठ सहायक अकेले इतनी बड़ी वित्तीय हेराफेरी कर सकता है या उसके पीछे कोई बड़ा तंत्र काम कर रहा था—यह अब जांच का सबसे बड़ा सवाल बन गया है। CAG ऑडिट में मामला सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग की आंतरिक वित्तीय निगरानी और अधिकारियों की जवाबदेही भी सवालों के घेरे में है।
अब देखना होगा कि विभागीय जांच और पुलिस कार्रवाई में इस कथित GPF घोटाले की पूरी रकम, जिम्मेदार लोगों और पूरे वित्तीय तंत्र का खुलासा कब तक होता है।
![]()


