महोबा। महोबा रेलवे स्टेशन पर अमृत भारत स्टेशन योजना के तहत विकास कार्य तेजी से जारी हैं। नया मुख्य प्रवेश द्वार लगभग तैयार हो चुका है, लेकिन इसी बीच एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पूरे विकास कार्य की पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जानकारी के अनुसार, पुराने प्लेटफॉर्म के सुंदरीकरण पर लगभग ₹5 करोड़ 40 लाख खर्च किए गए। इस परियोजना में पुराने मुख्य प्रवेश द्वार को भी पीवीसी शीट, आधुनिक फिनिशिंग और अन्य निर्माण कार्यों के माध्यम से आकर्षक स्वरूप दिया गया। लेकिन अब वही प्रवेश द्वार नए गेट के शुरू होते ही बंद कर दिया जाएगा।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब नया मुख्य प्रवेश द्वार पहले से प्रस्तावित था, तो फिर बंद होने वाले पुराने प्रवेश द्वार पर लाखों रुपये खर्च करने की आवश्यकता क्यों पड़ी? क्या संबंधित अधिकारियों को पहले से इसकी जानकारी नहीं थी, या फिर सरकारी धन खर्च करने में योजना और जवाबदेही की अनदेखी की गई?
सूत्रों के अनुसार, जिन मजबूत खंभों और संरचनाओं पर हाल ही में लाखों रुपये खर्च किए गए, अब उन्हें हटाने या तोड़ने की तैयारी भी की जा रही है। यदि ऐसा होता है तो पहले निर्माण पर खर्च और फिर ध्वस्तीकरण पर अलग खर्च—दोनों का बोझ सरकारी खजाने पर पड़ेगा। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या यह विकास की सुनियोजित प्रक्रिया है या फिर सरकारी धन के उपयोग में गंभीर लापरवाही?
जनता का कहना है कि टैक्स के पैसे से होने वाले हर खर्च का हिसाब होना चाहिए। यदि यह पूरा बदलाव पहले से तय था, तो अनावश्यक निर्माण कार्य क्यों कराया गया? और यदि योजना बाद में बदली गई, तो इसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय क्यों नहीं की जा रही?
अब लोगों की निगाहें रेलवे प्रशासन और झांसी मंडल के डीआरएम अनिरुद्ध कुमार पर हैं। जनता यह जानना चाहती है कि इस परियोजना की मूल योजना क्या थी, किन अधिकारियों ने इन कार्यों को स्वीकृति दी और ऐसे खर्चों की जवाबदेही किसकी होगी।
महोबा की जनता का सीधा सवाल है—क्या यह वास्तव में विकास है, या फिर विकास की आड़ में सरकारी धन की बर्बादी का एक और उदाहरण?
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