महोबा में इन दिनों विनोद पुरवार का नाम चर्चाओं में है। मामला सिर्फ कर्मचारी पर चोरी के आरोप लगाने तक सीमित नहीं है, बल्कि इस पूरे घटनाक्रम ने कई ऐसे सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब अब जांच के जरिए सामने आने चाहिए।
विनोद पुरवार का आरोप है कि उनका कर्मचारी वर्ष 2021 से चोरी कर रहा था और अब तक करीब पांच करोड़ रुपये की चोरी कर चुका है। बताया जाता है कि लगातार पांच वर्षों से कारोबार में घाटा होने की बात सामने आती रही। हर साल घाटे की शिकायत, कारोबार बंद करने की चर्चा और अगले साल फायदा होने की उम्मीद—अगर ये दावे सही हैं, तो सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर इतने वर्षों तक कारोबार का हिसाब-किताब कैसे चलता रहा?
पांच करोड़ की कथित चोरी हुई, तो हिसाब-किताब कहां था?
अगर किसी कर्मचारी पर पांच करोड़ रुपये की चोरी का आरोप है, तो यह मामूली मामला नहीं है। ऐसे में सवाल है कि चोरी का पता कब चला, हिसाब-किताब का ऑडिट हुआ या नहीं, और शिकायत मिलने के बाद पुलिस को तत्काल सूचना क्यों नहीं दी गई? यदि कारोबार में अनियमितताएं हुई हैं, तो उनकी भी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।
साथ ही, यदि करोड़ों रुपये का व्यापार बिना उचित बिलों के हुआ है, तो कर संबंधी रिकॉर्ड की जांच भी जरूरी है। हालांकि, बिना दस्तावेजी साक्ष्य के टैक्स चोरी को साबित हुआ तथ्य नहीं माना जा सकता।
इस पूरे मामले का सबसे गंभीर पहलू कर्मचारी के साथ कथित मारपीट और बंधक बनाए जाने के आरोप हैं। कर्मचारी की ओर से आरोप लगाया गया है कि उसे बंधक बनाकर बेरहमी से पीटा गया और उसके गुप्तांग में पेट्रोल डालने की तैयारी तक की गई। बताया गया कि परिजनों ने डायल 112 की मदद से उसे बचाया।
यदि ये आरोप सही पाए जाते हैं, तो मामला बेहद गंभीर है। किसी कर्मचारी पर पांच करोड़ रुपये की चोरी का आरोप हो, तब भी किसी को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार नहीं मिल जाता। चोरी की शिकायत पुलिस से की जा सकती थी, साक्ष्य सौंपे जा सकते थे और कानूनी कार्रवाई कराई जा सकती थी। अब सवाल है कि पुलिस इस घटनाक्रम की निष्पक्ष जांच कर संबंधित लोगों की भूमिका तय करेगी या नहीं?
विनोद पुरवार को लेकर चर्चाएं केवल कर्मचारी प्रकरण तक सीमित नहीं हैं। निजी कर्ज और पैसे के लेनदेन को लेकर भी तरह-तरह की बातें सामने आने का दावा किया जा रहा है। इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि और दस्तावेजी जांच जरूरी है।
वहीं, रामकथा स्थित मिल, मकान और दुकान के सौदे को लेकर भी विवाद की चर्चा है। दावा किया जा रहा है कि संपत्ति बेचने के लिए 18 महीने में खाली करने और रजिस्ट्री संबंधी शर्तों वाला एग्रीमेंट हुआ था, लेकिन लगभग 21 महीने बीतने और लगभग पूरी रकम दिए जाने के बावजूद रजिस्ट्री को लेकर विवाद बना हुआ है।
यहां सवाल सीधे हैं—क्या एग्रीमेंट की शर्तों का पालन हुआ? क्या भुगतान के प्रमाण मौजूद हैं? क्या रजिस्ट्री की कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई? फिलहाल विनोद पुरवार को कोर्ट का नोटिस मिल गया है और कार्यवाही जारी है बताया जाता है
मिल पर एसबीआई के करीब 10 करोड़ रुपये के कर्ज का दावा!
चर्चा यह भी है कि जिस मिल की बिक्री का मामला सामने आया है, उस पर पहले से भारतीय स्टेट बैंक की शाखा से करीब 10 करोड़ रुपये का कर्ज लिया गया था। यदि ऐसा है, तो ऋण की वास्तविक स्थिति, संपत्ति पर बैंक का बकाया, किसी बंधक या अन्य भार का विवरण और बिक्री के समय की कानूनी स्थिति की जांच बेहद जरूरी है। बैंक रिकॉर्ड और रजिस्ट्री के दस्तावेज ही इस दावे की पुष्टि कर सकते है!
विनोद पुरवार खुद को ईमानदार बता रहे हैं, लेकिन जब एक ओर कर्मचारी पर करोड़ों की चोरी का आरोप हो और दूसरी ओर मारपीट, बंधक बनाने तथा संपत्ति के लेनदेन को लेकर विवाद सामने आ रहे हों, तो केवल दावों से तस्वीर साफ नहीं होगी।
बताया जा रहा है कि धोखाधड़ी के मामले में अदालत से नोटिस मिलने की बात भी सामने आई है।
अब महोबा की नजर पुलिस और संबंधित जांच एजेंसियों पर है। कर्मचारी के साथ कथित मारपीट की निष्पक्ष जांच हो, पांच करोड़ रुपये की कथित चोरी के दावों का हिसाब सामने आए, कारोबार के टैक्स रिकॉर्ड की जांच हो और संपत्ति के सौदे तथा बैंक ऋण से जुड़े तथ्यों की पड़ताल हो—तभी इस पूरे मामले की असली तस्वीर सामने आ सकेगी।
क्योंकि सवाल किसी की छवि बनाने या बिगाड़ने का नहीं, बल्कि कानून, कारोबार और जवाबदेही का है। आखिर सच क्या है—यह न आरोप तय करेंगे, न सफाई इसका फैसला साक्ष्य और निष्पक्ष जांच से ही होना चाहिए।
![]()


