महोबा। प्रदेश सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने और सरकारी अस्पतालों को अत्याधुनिक सुविधाओं से लैस करने के बड़े-बड़े दावे कर रही है, लेकिन महोबा जिला अस्पताल की तस्वीरें इन दावों की हकीकत बयां कर रही हैं। सोमवार को जिला अस्पताल में बिजली व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई, जिससे अस्पताल की तैयारियों और जिम्मेदार अधिकारियों की कार्यशैली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।

जानकारी के अनुसार अस्पताल का मुख्य चेंजओवर सिस्टम अचानक खराब हो गया, जिसके चलते करीब तीन घंटे तक पूरे अस्पताल की बिजली आपूर्ति बाधित रही। हैरानी की बात यह रही कि आपातकालीन स्थिति से निपटने के लिए लगाया गया जनरेटर भी ओवरलोड के कारण जवाब दे गया। करोड़ों रुपये की लागत से खड़ी की गई व्यवस्थाएं उस समय बेकार साबित हुईं, जब मरीजों को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी।

बिजली गुल होते ही जिला अस्पताल का आईसीयू, इमरजेंसी वार्ड और सामान्य वार्ड अंधेरे में डूब गए। मरीजों और उनके परिजनों के सामने भारी संकट खड़ा हो गया। कई जगह मोबाइल फोन की टॉर्च जलाकर मरीजों की देखभाल की गई, जबकि कुछ स्थानों पर स्वास्थ्यकर्मी भी सीमित संसाधनों के सहारे काम करते दिखाई दिए।
भीषण गर्मी के बीच वार्डों में भर्ती मरीजों की हालत और खराब हो गई। बिजली न होने के कारण पंखे और कूलिंग सिस्टम बंद पड़ गए। तीमारदार हाथ के पंखों से मरीजों को हवा करते नजर आए। अस्पताल में मौजूद कई लोगों ने बताया कि गर्मी और उमस के कारण मरीजों की परेशानी कई गुना बढ़ गई थी।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि जिस अस्पताल में गंभीर मरीजों का इलाज होता है, वहां बिजली जैसी बुनियादी व्यवस्था का बैकअप भी पूरी तरह फेल हो गया। यदि इस दौरान कोई बड़ी चिकित्सकीय आपात स्थिति सामने आ जाती तो हालात और गंभीर हो सकते थे।
स्थानीय लोगों का कहना है कि जब भी किसी बड़े अधिकारी या जनप्रतिनिधि का निरीक्षण प्रस्तावित होता है, तब अस्पताल की व्यवस्थाएं अचानक चुस्त-दुरुस्त दिखाई देने लगती हैं। लेकिन निरीक्षण खत्म होते ही व्यवस्थाएं फिर पुराने ढर्रे पर लौट आती हैं। सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य व्यवस्थाएं केवल वीआईपी दौरों के लिए ही सजाई-संवारी जाती हैं?

जिला अस्पताल की यह स्थिति न केवल स्वास्थ्य विभाग की तैयारियों पर सवाल उठाती है, बल्कि यह भी दर्शाती है कि जिम्मेदार अधिकारी व्यवस्थाओं की निगरानी को लेकर कितने गंभीर हैं। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद यदि मरीजों को मोबाइल की टॉर्च की रोशनी में इलाज कराना पड़े, तो यह व्यवस्था की बड़ी विफलता मानी जाएगी।

अब देखना यह होगा कि इस गंभीर लापरवाही पर जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होती है या फिर यह मामला भी अन्य घटनाओं की तरह कुछ दिनों की चर्चा बनकर फाइलों में दब जाएगा।

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